रविवार, 16 जुलाई 2017

शिकायत

लोगो को शिकायत है हमसे,
की हम बात नही करते उनसे,
एक बार आवाज दे के तो देखो,
कैसे बात नही करते हम तुमसे।

हां मशरूफ हूँ मैं काम मे अपने,
बस गुफ्तगू का वक्त नही मिलता,
जिंदगी की इस भागदौड़ में,
मैं कई बार खुद से नही मिलता।

पर ये भी तो सच है,
जब आवाज दिया किसी ने,
दो मिनट समय निकाल के,
उसी वक्त बात किया हम ने।
--सुमन्त शेखर।

मंगलवार, 20 जून 2017

याद है

बीएमटीसी की बस में,
वो धक्के खाना याद है,
भीड़ भाड़ में बस में अक्सर,
छक के चढ़ना याद है,
सीट मिलने की आस में,
वो डट के रहना याद है,
चाहे बैग से या पैर से,
सीट के पासअड़े रहना याद है,
रोज रोज के सफर में अक्सर,
सबसे मिलना जुलना याद है,
मिले सीट तो फिर,
अच्छे से तन के सोना याद है,
कूदे बस जो गड्ढे में फिर
नींद से जगना याद है,
अपने स्टाप का अक्सर,
नींद में छूटना याद है,
फिर दूसरी बस से अक्सर,
वापस आना याद है,
पास रहने से पास में अपने,
बस में चढ़ना उतरना याद है,
बीएमटीसी की बस में,
वो धक्के खाना याद है।
बीएमटीसी की बस में,
वो धक्के खाना याद है,
--सुमन्त शेखर।

सोमवार, 22 मई 2017

नींद

रातभर मैं करवटें बदलता रहा,
रातभर मैं किश्तों में सोता रहा,
नींद तो आंखों को आती थी,
पर रह रह कर कही चली जाती,
रात भर मौसम को कोसते रहे,
रह रह कर पानी भी पीते रहे,
और ये कमबख्त नींद भी मुझे,
ना जाने कौन कौन से ख्वाब दिखाती रही,
कभी सपने में मुझे हँसाती, कभी रुलाती,
बार बार मुझे भगाती रहती,
मैं फिर उठता, पानी पीता और,
अगले सपने में भागने को तैयार रहता।
--सुमन्त शेखर

तड़ित

प्रचंड प्रबल वेग से,
पवन गतिमान है,
मेघाभिमान नभ में,
तड़ित प्रकाशमान है,
जलकणों में टूट से,
शीत का संचार है,
नवबिन्दु के प्रभाव से,
अंकुर में भी जान है।

लो हुई मेघों में मार है,
तड़ित की झंकार है,
जलबिंदु की बौछार है,
नभ का धरा पर वार है,
रात्रि का उसे साथ है,
सर्वत्र अंधकार है।
--सुमन्त शेखर।

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

केन्ट आम

ना दशहरी है भाया,
ना मालदा है आया,
अल्फांसो, मल्लिका,
बैगनपल्ली, सिंधुरा,
बादामी भी लगा फीका
जब केन्ट को मैंने चखा।
कोई आम हो ऐसा,
जो तुम्हे लगा हो अच्छा,
जल्दी से बता दो रे भईया,
मुझे भी है चखना।
©सुमन्त शेखर।

गुरुवार, 30 मार्च 2017

विमान यात्रा

इंडिगो विमान में सांध्यकालीन यात्रा के दौरान महसूस किये गए कुछ पलों को आपसे साझा करना  चाहूंगा।

उड़ते हुए विमान से,
जब नीचे देखा रात में,
लगा दहकते अंगार बिछे हैं,
बिजली से रोशन घरबार से।
ऊपर चाँद,
नीचे अंगार,
मध्य में दोनों के,
इंडिगो विमान,
भीतर प्रकाशमान,
बहार घना अंधकार,
अँधेरे में लगते जुगनु,
प्रकाश से रोशन अकेले घर,
नीचे सड़कें है मानो,
कोई जलता हुआ शाख,
कहीं जलते हुए कोयले,
पर बुझी हुई राख,
कहीं एकदम लाल,
कहीं उजली सी दरार,
अन्य जगहों पर है,
कला अँधेरा बरक़रार,
तेज हवा के झोकों की,
आ रही ये आवाज,
परिचारिकायें कर रही,
चाय, पानी का व्यापार,
कोई तो पूछ ले,
इनकी मुस्कराहट का राज,
विमान के डैनों पर,
वो भुकभुकाता बल्ब,
लगता जैसे बता रहा है,
घबराओ मत, मैं हु इधर,
ठीक सर के ऊपर,
लगा है एसी का बटन,
घुमा के सेट करो
हवा ज्यादा चाहिए या कम,
बगल में लगा है एक स्पीकर,
जिसपर कैप्टेन करे है वेलकम,
और परिचारिकायें बताएं,
कौन है आज का विमान दल,
कुर्सी की पेटी बांध ले,
विमान उड़ने को तैयार है,
विमान में कितने है द्वार,
क्या आपातकालीन विचार है,
फिर से एक आवाज आई है,
विमान गंतव्य पर उतरने को तैयार है,
कर्मी दल को यह उम्मीद है,
कि उन्होंने यात्रा सुखद कराई है।
धन्यवाद....
©सुमन्त शेखर।

सोमवार, 27 मार्च 2017

योगिया

योगिया के आदेश पर,
यूपी में नवरात्र भईल,
राम मंदिर छा गइल,
मांस मच्छी बंद भईल।

भगवा के खेल बा,
विरोधी सब जलल बा,
फैलल इ अफवाह बा,
कि जोगिया न पुरा सेकुलर बा।

गोरखनाथ के मंदिर दिखल,
जहाँ न धरम-जाति के नाम दिखल,
जहाँ हिंदु मुस्लिम एक लगल,
केकरा महंत सेकुलर बुझल।

--©सुमन्त शेखर